गर्भस्थ शिशु संरक्षण समिति के 30 गौरवशाली वर्ष : यज्ञ, वृक्ष पूजन एवं गंगाजल वितरण के साथ मनाया गौरव दिवस
कुचामन सिटी। समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने और गर्भस्थ शिशुओं की रक्षा के लिए निरंतर कार्यरत गर्भस्थ शिशु संरक्षण समिति भारत ने अपने स्थापना के 30 वर्ष पूर्ण होने पर गौरव दिवस उत्साह एवं श्रद्धा के साथ मनाया। कुचामन शाखा द्वारा सीकर रोड स्थित गायत्री शक्तिपीठ में आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में धार्मिक, सामाजिक एवं पर्यावरण संरक्षण से जुड़े विभिन्न आयोजन किए गए। कार्यक्रम राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष श्यामसुंदर मंत्री के सान्निध्य में सम्पन्न हुआ।
यह अवसर केवल एक संस्था की वर्षगांठ का नहीं था, बल्कि तीन दशकों से चल रहे उस जनजागरण अभियान के सम्मान का था, जिसने समाज को भ्रूण हत्या जैसी गंभीर सामाजिक बुराई के प्रति जागरूक करने और सनातन मूल्यों के संरक्षण के लिए सतत प्रयास किए हैं।

30 वर्ष पूर्व हुई थी समिति की स्थापना
राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष श्यामसुंदर मंत्री ने बताया कि गर्भस्थ शिशु संरक्षण समिति भारत की स्थापना 3 जून 1996 को ऋषिकेश स्थित गीताभवन नम्बर 3 में परम पूज्य ब्रह्मलीन विरक्त त्यागी संत स्वामी रामसुखदास महाराज के आशीर्वाद एवं प्रेरणा से हुई थी। स्थापना के समय से ही समिति ने गर्भस्थ शिशुओं की रक्षा, भ्रूण हत्या की रोकथाम, सनातन संस्कृति के संरक्षण, संस्कारों के संवर्धन तथा जनजागरण को अपना प्रमुख उद्देश्य बनाया।
उन्होंने बताया कि आज समिति की शाखाएँ देश के विभिन्न राज्यों में सक्रिय रूप से कार्य कर रही हैं। विशेष बात यह है कि संस्था बिना चंदा संग्रह और बिना कोषाध्यक्ष पद की व्यवस्था के सेवाभाव एवं जनसहयोग के आधार पर अपने अभियान संचालित कर रही है, जो अपने आप में एक अनुकरणीय उदाहरण है।
गौरव दिवस के रूप में मनाया गया स्थापना दिवस
कुचामन इकाई के अध्यक्ष सत्यप्रकाश शर्मा ने बताया कि समिति के 30 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में स्थापना दिवस को “गौरव दिवस” के रूप में मनाया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य संस्था की तीन दशक लंबी सेवायात्रा को स्मरण करना तथा समाज में उसके संदेश को और अधिक व्यापक बनाना था।
गायत्री शक्तिपीठ में परिव्राजक महेश चौरसिया के सानिध्य में वैदिक मंत्रोच्चार के साथ यज्ञ एवं हवन का आयोजन किया गया। विश्व कल्याण, मानवता की मंगलकामना तथा समाज में सुख, शांति और समृद्धि के लिए उपस्थित साधकों एवं श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक आहुतियाँ अर्पित कीं।
पर्यावरण संरक्षण और जल संवर्धन का संदेश
कार्यक्रम के दौरान पर्यावरण संरक्षण के प्रति जनजागरण का विशेष संदेश भी दिया गया। इस अवसर पर आंवला, पीपल एवं वट वृक्षों का पूजन कर प्रकृति के प्रति सम्मान एवं संरक्षण का संकल्प दोहराया गया। भारतीय संस्कृति में इन वृक्षों का विशेष धार्मिक और पर्यावरणीय महत्व माना जाता है, जो जीवन को संतुलित एवं समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इसके साथ ही समिति के “वन्दे जल संरक्षण” अभियान के अंतर्गत श्रद्धालुओं को गंगाजल वितरित किया गया। कार्यक्रम में जल संरक्षण, जल की महत्ता तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए जल संसाधनों को सुरक्षित रखने की आवश्यकता पर भी विस्तार से प्रकाश डाला गया।
प्रदेश सचिव श्यामसुंदर सैनी ने कहा कि वृक्ष और जल मानव जीवन के मूल आधार हैं। यदि इनके संरक्षण के प्रति समाज जागरूक नहीं हुआ तो स्वस्थ और समृद्ध भविष्य की कल्पना करना कठिन होगा। उन्होंने सभी नागरिकों से पर्यावरण एवं जल संरक्षण को जनआंदोलन बनाने का आह्वान किया।

समाजहित में सेवा और संस्कारों की निरंतर यात्रा
गर्भस्थ शिशु संरक्षण समिति की 30 वर्षीय यात्रा केवल एक संगठन की उपलब्धि नहीं, बल्कि उन हजारों कार्यकर्ताओं और साधकों के समर्पण का परिणाम है जिन्होंने समाज में जागरूकता फैलाने, संस्कारों को सशक्त बनाने और मानव जीवन के मूल्यों को संरक्षित रखने के लिए निरंतर कार्य किया है।
समिति द्वारा समय-समय पर चलाए जाने वाले जनजागरण अभियान, संस्कार निर्माण कार्यक्रम, पर्यावरण संरक्षण गतिविधियाँ तथा गर्भस्थ शिशुओं की सुरक्षा के लिए किए जा रहे प्रयास समाज को सकारात्मक दिशा प्रदान कर रहे हैं।
गणमान्य नागरिकों की रही सहभागिता
गौरव दिवस कार्यक्रम में प्रदेश सचिव श्यामसुंदर सैनी सपत्नीक, कुचामन शाखा सचिव परमानंद अग्रवाल, वरिष्ठ साधक सत्यनारायण मोर, गिरधारीलाल दीक्षित, संगीता चौरसिया, श्रीदेवी दीक्षित सहित अनेक साधक एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
सभी उपस्थितजनों ने समिति की 30 वर्ष की गौरवशाली सेवायात्रा पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए संकल्प लिया कि भ्रूण संरक्षण, संस्कार संवर्धन, पर्यावरण संरक्षण एवं जनजागरण के अभियानों को और अधिक व्यापक बनाया जाएगा, ताकि आने वाली पीढ़ियों को एक स्वस्थ, संस्कारित और जागरूक समाज प्रदान किया जा सके।
तीन दशकों की यह यात्रा सेवा, संस्कार, समर्पण और सामाजिक चेतना की प्रेरक गाथा है। गर्भस्थ शिशु संरक्षण समिति का यह गौरव दिवस न केवल अतीत की उपलब्धियों का उत्सव था, बल्कि भविष्य में और अधिक प्रभावी जनसेवा के संकल्प का भी प्रतीक बनकर सामने आया।
